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वन पर्व
अध्याय २५
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अर्जुन उवाच
यः सर्वलोकद्वाराणि नित्यं सञ्चरते वशी |  ७   क
देवलोकाद्व्रह्मलोकं गन्धर्वाप्सरसामपि ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति