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उद्योग पर्व
अध्याय २५
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सञ्जय़ उवाच
महद्वलं धार्तराष्ट्रस्य राज्ञः; को वै शक्तो हन्तुमक्षीय़माणः |  १२   क
सोऽहं जय़े चैव पराजय़े च; निःश्रेय़सं नाधिगच्छामि किञ्चित् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति