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उद्योग पर्व
अध्याय २५
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सञ्जय़ उवाच
कथं हि नीचा इव दौष्कुलेय़ा; निर्धर्मार्थं कर्म कुर्युश्च पार्थाः |  १३   क
सोऽहं प्रसाद्य प्रणतो वासुदेवं; पाञ्चालानामधिपं चैव वृद्धम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति