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शान्ति पर्व
अध्याय १४५
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भीष्म उवाच
युधिष्ठिर महानेष धर्मो धर्मभृतां वर |  १८   क
गोघ्नेष्वपि भवेदस्मिन्निष्कृतिः पापकर्मणः |  १८   ख
निष्कृतिर्न भवेत्तस्मिन्यो हन्याच्छरणागतम् ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति