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भीष्म पर्व
अध्याय २५
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श्रीभगवानु उवाच
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः |  १७   क
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति