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शान्ति पर्व
अध्याय ८
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्मं संहरते तस्य धनं हरति यस्य यः |  १३   क
ह्रिय़माणे धने राजन्वय़ं कस्य क्षमेमहि ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति