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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
अहं तु यत्नमास्थाय़ त्वदर्थे त्यक्तजीवितः |  ९   क
एष गच्छामि सङ्ग्रामं त्वत्कृते कुरुनन्दन ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति