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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
व्रह्मदत्तवरः स्कन्द त्वय़ाय़ं महिषो हतः |  ७३   क
देवास्तृणमय़ा यस्य वभूवुर्जय़तां वर |  ७३   ख
सोऽय़ं त्वय़ा महावाहो शमितो देवकण्टकः ||  ७३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति