कर्ण पर्व  अध्याय २८

सञ्जय़ उवाच

तमहं पतिता काक नान्यं जानामि कञ्चन |  २९   क
पत त्वमपि रक्ताक्ष येन वा तेन मन्यसे ||  २९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति