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द्रोण पर्व
अध्याय २५
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सञ्जय़ उवाच
वृहतः सैन्धवानश्वान्समुत्थाप्य तु सारथिः |  ३७   क
तस्थौ सात्यकिमासाद्य सम्प्लुतस्तं रथं पुनः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति