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कर्ण पर्व
अध्याय ३०
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सञ्जय़ उवाच
व्राह्मणेन तथा प्रोक्तं विदुषा साधुसंसदि |  ३८   क
काष्ठकुण्डेषु वाह्लीका मृण्मय़ेषु च भुञ्जते |  ३८   ख
सक्तुवाट्यावलिप्तेषु श्वादिलीढेषु निर्घृणाः ||  ३८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति