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कर्ण पर्व
अध्याय २५
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सञ्जय़ उवाच
एवं चेन्मन्यसे राजन्गान्धारे प्रिय़दर्शन |  ४   क
तस्मात्ते यत्प्रिय़ं किञ्चित्तत्सर्वं करवाण्यहम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति