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कर्ण पर्व
अध्याय २५
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सञ्जय़ उवाच
यत्रास्मि भरतश्रेष्ठ योग्यः कर्मणि कर्हिचित् |  ५   क
तत्र सर्वात्मना युक्तो वक्ष्ये कार्यधुरं तव ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति