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शल्य पर्व
अध्याय २५
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सञ्जय़ उवाच
विक्षिपन्सुमहच्चापं कार्तस्वरविभूषितम् |  १८   क
विसृजन्साय़कांश्चैव विषाग्निप्रतिमान्वहून् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति