सभा पर्व  अध्याय २५

वैशम्पाय़न उवाच

पार्थ नेदं त्वय़ा शक्यं पुरं जेतुं कथञ्चन |  ९   क
उपावर्तस्व कल्याण पर्याप्तमिदमच्युत ||  ९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति