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अनुशासन पर्व
अध्याय ५७
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वैशम्पाय़न उवाच
नित्यस्नाय़ी भवेद्दक्षः सन्ध्ये तु द्वे जपन्द्विजः |  १४   क
मरुं साधय़तो राज्यं नाकपृष्ठमनाशके ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति