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शल्य पर्व
अध्याय २५
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सञ्जय़ उवाच
छिन्नोत्तमाङ्गस्य ततः क्षुरप्रेण महात्मनः |  २८   क
पपात काय़ः स रथाद्वसुधामनुनादय़न् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति