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शल्य पर्व
अध्याय २५
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सञ्जय़ उवाच
ततः पञ्चशतान्हत्वा सवरूथान्महारथान् |  ३२   क
जघान कुञ्जरानीकं पुनः सप्तशतं युधि ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति