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शान्ति पर्व
अध्याय २५०
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नारद उवाच
प्रससाद किल व्रह्मा स्वय़मेवात्मनात्मवान् |  १३   क
स्मय़मानश्च लोकेशो लोकान्सर्वानवैक्षत ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति