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शान्ति पर्व
अध्याय २५०
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नारद उवाच
ततो जगाम सा कन्या कौशिकीं भरतर्षभ |  २१   क
तत्र वाय़ुजलाहारा चचार निय़मं पुनः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति