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शान्ति पर्व
अध्याय २५०
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नारद उवाच
अधर्मो नास्ति ते मृत्यो संय़च्छेमाः प्रजाः शुभे |  २७   क
मय़ा ह्युक्तं मृषा भद्रे भविता नेह किञ्चन ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति