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वन पर्व
अध्याय २५०
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वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीद्द्रौपदी राजपुत्री; पृष्टा शिवीनां प्रवरेण तेन |  १   क
अवेक्ष्य मन्दं प्रविमुच्य शाखां; सङ्गृह्णती कौशिकमुत्तरीय़म् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति