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वन पर्व
अध्याय २५०
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वैशम्पाय़न उवाच
अपत्यमस्मि द्रुपदस्य राज्ञः; कृष्णेति मां शैव्य विदुर्मनुष्याः |  ५   क
साहं वृणे पञ्च जनान्पतित्वे; ये खाण्डवप्रस्थगताः श्रुतास्ते ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति