शान्ति पर्व  अध्याय २५१

युधिष्ठिर उवाच

धर्मो न्वय़मिहार्थः किममुत्रार्थोऽपि वा भवेत् |  २   क
उभय़ार्थोऽपि वा धर्मस्तन्मे व्रूहि पितामह ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति