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शान्ति पर्व
अध्याय ३३८
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जनमेजय़ उवाच
वहवः पुरुषा व्रह्मन्नुताहो एक एव तु |  १   क
को ह्यत्र पुरुषः श्रेष्ठः को वा योनिरिहोच्यते ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति