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वन पर्व
अध्याय २५१
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जय़द्रथ उवाच
कुशलं प्रातराशस्य सर्वा मेऽपचितिः कृता |  १४   क
एहि मे रथमारोह सुखमाप्नुहि केवलम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति