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वन पर्व
अध्याय २५१
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जय़द्रथ उवाच
न वै प्राज्ञा गतश्रीकं भर्तारमुपय़ुञ्जते |  १६   क
युञ्जानमनुय़ुञ्जीत न श्रिय़ः सङ्क्षय़े वसेत् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति