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वन पर्व
अध्याय २५१
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जय़द्रथ उवाच
श्रिय़ा विहीना राज्याच्च विनष्टाः शाश्वतीः समाः |  १७   क
अलं ते पाण्डुपुत्राणां भक्त्या क्लेशमुपासितुम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति