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वन पर्व
अध्याय २५१
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वैशम्पाय़न उवाच
स प्रविश्याश्रमं शून्यं सिंहगोष्ठं वृको यथा |  ८   क
आत्मना सप्तमः कृष्णामिदं वचनमव्रवीत् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति