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शान्ति पर्व
अध्याय २५२
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युधिष्ठिर उवाच
तेनैवान्यः प्रभवति सोऽपरं वाधते पुनः |  १८   क
दृश्यते चैव स पुनस्तुल्यरूपो यदृच्छय़ा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति