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वन पर्व
अध्याय २५२
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जय़द्रथ उवाच
सा क्षिप्रमातिष्ठ गजं रथं वा; न वाक्यमात्रेण वय़ं हि शक्याः |  १२   क
आशंस वा त्वं कृपणं वदन्ती; सौवीरराजस्य पुनः प्रसादम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति