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वन पर्व
अध्याय २५२
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द्रौपद्यु उवाच
महावला किं त्विह दुर्वलेव; सौवीरराजस्य मताहमस्मि |  १३   क
याहं प्रमाथादिह सम्प्रतीता; सौवीरराजं कृपणं वदेय़म् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति