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वन पर्व
अध्याय २५२
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द्रौपद्यु उवाच
यस्या हि कृष्णौ पदवीं चरेतां; समास्थितावेकरथे सहाय़ौ |  १४   क
इन्द्रोऽपि तां नापहरेत्कथं चि; न्मनुष्यमात्रः कृपणः कुतोऽन्यः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति