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वन पर्व
अध्याय २५२
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द्रौपद्यु उवाच
गाण्डीवमुक्तांश्च महाशरौघा; न्पतङ्गसङ्घानिव शीघ्रवेगान् |  १८   क
सशङ्खघोषः सतलत्रघोषो; गाण्डीवधन्वा मुहुरुद्वमंश्च |  १८   ख
यदा शरानर्पय़िता तवोरसि; तदा मनस्ते किमिवाभविष्यत् ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति