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वन पर्व
अध्याय २५२
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वैशम्पाय़न उवाच
यशस्विनस्तीक्ष्णविषान्महारथा; नधिक्षिपन्मूढ न लज्जसे कथम् |  २   क
महेन्द्रकल्पान्निरतान्स्वकर्मसु; स्थितान्समूहेष्वपि यक्षरक्षसाम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति