वन पर्व  अध्याय २५२

वैशम्पाय़न उवाच

जग्राह तामुत्तरवस्त्रदेशे; जय़द्रथस्तं समवाक्षिपत्सा |  २३   क
तय़ा समाक्षिप्ततनुः स पापः; पपात शाखीव निकृत्तमूलः ||  २३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति