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शान्ति पर्व
अध्याय ६५
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इन्द्र उवाच
विनष्टाय़ां दण्डनीतौ राजधर्मे निराकृते |  २४   क
सम्प्रमुह्यन्ति भूतानि राजदौरात्म्यतो नृप ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति