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वन पर्व
अध्याय २५२
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वैशम्पाय़न उवाच
अहं तु मन्ये तव नास्ति कश्चि; देतादृशे क्षत्रिय़संनिवेशे |  ४   क
यस्त्वाद्य पातालमुखे पतन्तं; पाणौ गृहीत्वा प्रतिसंहरेत ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति