वन पर्व  अध्याय २५२

वैशम्पाय़न उवाच

नागं प्रभिन्नं गिरिकूटकल्प; मुपत्यकां हैमवतीं चरन्तम् |  ५   क
दण्डीव यूथादपसेधसे त्वं; यो जेतुमाशंससि धर्मराजम् ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति