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वन पर्व
अध्याय २५२
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वैशम्पाय़न उवाच
महावलं घोरतरं प्रवृद्धं; जातं हरिं पर्वतकन्दरेषु |  ७   क
प्रसुप्तमुग्रं प्रपदेन हंसि; यः क्रुद्धमासेत्स्यसि जिष्णुमुग्रम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति