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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
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श्वशुर उवाच
शुद्धेन तव दानेन न्याय़ोपात्तेन यत्नतः |  ५७   क
यथाशक्ति विमुक्तेन प्रीतोऽस्मि द्विजसत्तम ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति