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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमेव मनुष्येन्द्र धर्मं त्यक्त्वाल्पकं नरः |  ६५   क
वृहन्तं धर्ममाप्नोति स वुद्ध इति निश्चितः ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति