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शान्ति पर्व
अध्याय २५३
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भीष्म उवाच
अण्डेभ्यस्त्वथ पुष्टेभ्यः प्रजाय़न्त शकुन्तकाः |  २७   क
व्यवर्धन्त च तत्रैव न चाकम्पत जाजलिः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति