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शान्ति पर्व
अध्याय २५३
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भीष्म उवाच
अथ ते दिवसं चारीं गत्वा साय़ं पुनर्नृप |  ३४   क
उपावर्तन्त तत्रैव निवासार्थं शकुन्तकाः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति