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शान्ति पर्व
अध्याय २५३
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तुलाधार उवाच
सागरानूपमाश्रित्य तपस्तप्तं त्वय़ा महत् |  ४८   क
न च धर्मस्य सञ्ज्ञां त्वं पुरा वेत्थ कथञ्चन ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति