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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
गतास्तु दक्षिणामाशां ये वै वानरपुङ्गवाः |  २४   क
आशावांस्तेषु काकुत्स्थः प्राणानार्तोऽप्यधारय़त् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति