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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
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व्राह्मण उवाच
न त्वसौ चक्षुषा ग्राह्यो न च सर्वैरपीन्द्रिय़ैः |  ४४   क
मनसैव प्रदीपेन महानात्मनि दृश्यते ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति