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वन पर्व
अध्याय २५३
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वैशम्पाय़न उवाच
यद्येव देवी पृथिवीं प्रविष्टा; दिवं प्रपन्नाप्यथ वा समुद्रम् |  १२   क
तस्या गमिष्यन्ति पदं हि पार्था; स्तथा हि सन्तप्यति धर्मराजः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति