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वन पर्व
अध्याय २५३
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वैशम्पाय़न उवाच
को हीदृशानामरिमर्दनानां; क्लेशक्षमाणामपराजितानाम् |  १३   क
प्राणैः समामिष्टतमां जिहीर्षे; दनुत्तमं रत्नमिव प्रमूढः |  १३   ख
न वुध्यते नाथवतीमिहाद्य; वहिश्चरं हृदय़ं पाण्डवानाम् ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति