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द्रोण पर्व
अध्याय १४७
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सञ्जय़ उवाच
तमसा संवृते लोके न प्राज्ञाय़त किञ्चन |  २०   क
कौरवाणां प्रकाशेन दृश्यन्ते तु द्रुताः परे ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति